Surdas In Hindi Essay Writing

Surdas – सूरदास 15 वी शताब्दी के अंधे संत, कवी और संगीतकार थे। सूरदास का नाम भक्ति की धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सर्वोपरि है। सूरदास अपने भगवान कृष्ण पर लिखी भक्ति गीतों के लिये जाने जाते है।

संत सूरदास की भक्तिपूर्वक जीवनी – Surdas Biography In Hindi

सूरदास ने अपने संग्रह “सुर सागर” में तक़रीबन हज़ार से भी ज्यादा गीतों की रचना की है जिनमे से 8000 आज भी विद्यमान है। उन्हें एक सगुण भक्ति का कवी कहा जाता था और वे संत सूरदास के नाम से प्रसिद्ध थे। उनके नाम का अर्थ भी “मधुर संगीत का संत” होता है।

सूरदास का प्रारंभिक जीवन – Surdas Ka Jeevan Parichay In Hindi

सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषयो में विद्वानों में मतभेद है। लेकिन फिर भी कुछ विद्वानों का ऐसा मानना है की उनका जन्म 1478 में हुआ तो कुछ का मानना है की उनका जन्म 1479 में हुआ। उनके मृत्यु वर्ष के संबंध में भी मतभेद भी है। उनके मृत्यु वर्ष को 1581 या 1584 माना जाता है। लेकिन सूरदास के इतिहास को देखकर लगता है की उनका जन्म मथुरा के रुनकता ग्राम में हुआ था। जब वे किशोर थे तभी से उन्होंने कृष्ण भक्ति की शुरुवात कर दी थी। पारिवारिक अनदेखी की वजह से सूरदास जन्म से ही अंधे थे। परिणामतः सूरदास ने 6 साल की आयु में ही घर छोड़ दिया। बाद में बे मथुरा के ही पास ब्रज में रहने लगे थे।

सूरदास की मधुर कविताये और भक्तिमय गीत लोगो को भगवान् की तरफ आकर्षित करते थे। धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढती गयी, और मुघल शासक अकबर (1542-1605) भी उन्हें दर्शक बन गये। सूरदास ने अपने जीवन के अंतिम वर्षो को ब्रज में बिताया। और भजन गाने के बदले उन्हें जो कुछ भी मिलता उन्ही से उनका गुजारा होता था। कहा जाता है की इसवी सन 1584 में उनकी मृत्यु हुई थी।

सूरदास का काव्यात्मक काम :

सूरदास को हिंदी साहित्य का सूरज कहा जाता है। वे अपनी कृति “सूरसागर” के लिये प्रसिद्ध है। कहा जाता है की उनकी इस कृति में लगभग 100000 गीत है, जिनमे से आज केवल 8000 ही बचे है। उनके इन गीतों में कृष्ण के बचपन और उनकी लीला का वर्णन किया गया है।
सूरदास कृष्ण भक्ति के साथ ही अपनी प्रसिद्ध कृति सूरसागर के लिये भी जाने जाते है। इतना ही नहीं सूरसागर के साथ उन्होंने सुर-सारावली और सहित्य-लहरी की भी रचना की है।

सूरदास की कविताओ में हमें पुराने कथनों का उल्लेख बहोत स्थानों पर देखने को मिलता है। सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते है तो मानो अलंकार-शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओ की बाढ़ आ जाती है और रुपको की वर्षा होने लगती है।
इस प्रकार हम देखते है की सूरदास हिंदी साहित्य के महाकवि है, क्योकि उन्होंने न केवल भाव और भाषा की दृष्टी से साहित्य को सजाया है बल्कि कृष्ण-काव्य की विशिष्ट परंपरा को भी जन्म दिया है।

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Gyani Pandit

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सूरदास 

Surdas

सूरदास का संबंध मध्यकाल (भक्ति काल) के सगुणवादी भक्ति आंदोलन से है। जीवन और काव्यू को मधुर-कोमल भावों से सजाने-संवारने वाले महाकवियों में भक्तप्रवर सूरदास की गणना प्रमुख रूप से होती है। मध्य काल में गोस्वामी बल्लभाचार्य ने जिस कृष्णभक्ति शाखा की प्रतिष्ठा और प्रचार किया था, सूरदास उसके प्रमुख कवि और गायक माने जाते हैं। परंतु खेद के साथ कहना पड़ता है कि इनका जीवन-परिचय अभी तक विद्वानों में मतभेद का विषय बना हुआ है। कई प्रकार की कहानियां और किंवदंतियां इनके जीवन के बारे में प्रचलित हैं। अंतिम निर्णय होना अभी शेष है। वह पता नहीं कभी संभव हो भी पाएगा कि नहीं।

इनके जन्म स्थान के बारे में कई मतभेद पाए जाते हैं। एक मत के अनुसार इनका जन्म-स्थान रुनकता नामक क्षेत्र था। पर अन्य मत के अनुसार इनका जन्म बल्लभगढ़-गुडग़ांव नामक क्षेत्र था। एक मान्यता के अनुसार इनका जन्म बैशाख मास शुक्ल पंचमी के दिन संवत 1535 में हुआ माना जाता है। माता-पिता कौन और क्या थे, यह अभी तक अंतिम रूप से पता नहीं चल सका। कहा जाता है कि इनके पिता कथावाचक थे। दो बड़े भाई भी थे, जो सूर के अंधे होने पर मधुर-स्वर और कविता-शक्ति की बदौलत बचपन में ही सम्मानित होने के कारण जलने लगे थे। बाद में उन्होंने पिता से कहकर इन्हें घर से निकलवा दिया था। भटकते हुए गऊघाट पर पहुंच गा-गाकर अपनी रोजी-रोटी पाने लगे थे। कुछ लोग इन्हें प्रसिद्ध कवि चंदरवरदाई का वशंज ब्रह्मभट भी मानते हैं जबकि कुछ लोग इन्हें प्रसिद्ध कवि चंदरवरदाई का वशंज ब्रह्भाट भी मानते हैं जबकि कुछ लोग इन्हें पहले का पं. विल्व मंगल कहते हैं, जिसने एक वेश्या के प्रेम में पागल हो अपनी आंखें आप ही फोड़ ली थी। इसी प्रकार कुछ लोग कहते हैं कि सूरदास जन्म से अंधे थे, कुछ मानते हैं कि प्रेम में इन्होंने निराश होकर आंखें फोड़ ली थीं, कुछ लोग कहते हैं कि युद्ध में इनकी आंखें जाती रही थीं। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण की कृपा-भक्ति से इन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई थी, जिसके प्रभाव से इन्होंने अपने काव्य में प्रकृति और रंगों आदि का बड़ा सजीव, यथाथ एंव प्रभावी वर्णन किया है।

सूरदास गोस्वामी बल्लभाचार्य के शिष्य थे। इस शिष्यता के बारे में भी एक घटना प्रचलित है। कहते हैं कि सूरदास मथुरा-आगरा-राजपथ पर स्थित गऊघाट पर अपने शिष्यों-भक्तों के साथ रहकर कृष्ण भक्ति के पद गाया करते। अपनी धर्म-प्रचार यात्रा के दौरान एक बार वहां पहुंच गोस्वामी बल्लभाचार्य ने इन्हें गाते सुना, देखा। प्रभावित होकर इन्हें अपना शिष्य बना लिया और कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। इन्हें मथुरा के प्रसिद्ध श्रीनाथ मंदिर का प्रमुख कीर्तनिया भी बना दिया। वहीं रहकर सूरदास जीवन भर लीला के पद रचते-गाते रहे। इनका स्वर्गवास संवत 1600 में पारसौली नामक स्थान पर हुआ माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि अपने जीवन-काल में सूरदास ने सवाल लाख के लगभग पद रचे थे। यह संख्या सागर के समान अथाह होने के कारण ही इनकी प्रमुख रचना का नाम ‘सूर सागर’ रखा गया है। गुरु बल्लभचार्य इन्हें ‘सागर’ कहकर पुकारा करते थे। जो हो, आजकल उपलब्ध ‘सूर सागर’ में चार-पांच हजार से अधिक पद नहीं मिलते। इनमें इन्होंने श्रीमदभागवत पुराण के दशम स्कंध के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर मथुरा गमन तक की लीलाओं का गायन किया है। ‘सूर-सागर’ के अंतिम भाग को ‘भ्रमर गीत’ कहा जाता है। इसमें ब्रजवासिायों के कृष्ण-विरह का मार्मिक वर्णन तो है ही, सगुण-साकार ब्रह्म की महिमा भी प्रतिष्ठित कर, प्रेम-माधुर्य-भाव से उसकी भक्ति करने की प्रेरणा दी गई है। वात्सल्य रस के गायन में सूरदास अपना सानी नहीं रखते। सख्य भाव का उत्कर्ष और परिष्कार भी सूर से बढक़र अन्य कोई कवि नहीं कर सकता। संयोग और वियोग श्रंगार वर्णनों में भी वे अद्वितीय हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में ‘वात्सल्य भाव का तो वो कोना-कोना झांक आए थे।’ इसे कथन की अत्युक्ति न मान पूर्ण सार्थक कहा जा सकता है।

जहां तक रचनाओं का प्रश्न है, यों ‘सूरसागर’ के अतिरिक्त इनके चौबीस ग्रंथ ओर कहे जाते हैं, पर उनका कोई विशेष महत्व या विश्वसनीयता नहीं है। उनमं से ‘साहित्य लहरी’ और ‘सूर सारावली’ को अवश्य कुछ महत्व दिया जाता है। पर कवित्व की दृष्टि से ये दोनों भी महत्वहीन ही हैं। सूरदास की काव्य -भाशा ब्रज है। ब्रज भाषा का लालित्य इनकी कविता में साकार हो उठा है। प्रबंध का भाव प्रतीत होते हुए भी ‘सूर-सागर’ प्रगीत-मुक्तक काव्य ही माना जाता है। यह सत्य है कि सूरदास का काव्य जीवन के अन्य व्यवहार क्षेत्रों में रिक्त है, केवल माधुर्यभाव ही उसमें प्रमुख्पा है, पर उसमें जो और जितना भी है, वह वस्तुत: अद्वितीय और सूरदास की अमरता का कारण एंव प्रमाण है। हिंदी साहित्य में उसका साथी खोजने पर भी मिल पाना संभव नहीं है। इसी कारण इन्हें काव्य जगत का सूर अर्थात सूरज कहा-माना गया है।

July 21, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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